दुर्ग। छत्तीसगढ़ की माटी, लोकजीवन, संस्कृति और मातृभाषा की सुगंध को अपनी लेखनी में समेटकर साहित्य के विस्तृत आकाश में विशिष्ट पहचान स्थापित करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के ऐसे साधक हैं, जिनका योगदान केवल साहित्य सृजन तक सीमित नहीं है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को शैक्षणिक, अकादमिक और साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए चार दशकों तक निरंतर साधना की है।
जन्म, शिक्षा एवं साहित्यिक यात्रा
दुर्गा प्रसाद पारकर का जन्म 11 मई 1961 को ग्राम बेलौदी (मालूद), जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ में हुआ। उनकी स्कूली एवं उच्च शिक्षा ग्राम बेलौदी, पैरी, नगपुरा, नेशनल स्कूल दुर्ग तथा सेठ रतनचंद सुराना महाविद्यालय, दुर्ग में हुई। उन्होंने एम.कॉम. एवं एम.ए. (हिंदी) की शिक्षा प्राप्त की है।
छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनकी गहरी निष्ठा और अकादमिक प्रयासों ने उन्हें इस भाषा के उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्तित्व बनाया। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. छत्तीसगढ़ी के प्रवर्तक के रूप में उनकी पहचान स्थापित हुई।
लेखन से लेकर अकादमिक प्रतिष्ठा तक
दुर्गा प्रसाद पारकर का सबसे उल्लेखनीय योगदान छत्तीसगढ़ी भाषा को विश्वविद्यालयीन शिक्षा में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास है। वर्ष 2007 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया। इसके बाद वर्ष 2013 में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में छत्तीसगढ़ी भाषा को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया। इस दिशा में पारकर जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उनकी साहित्यिक कृतियों को विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना उनके रचनात्मक अवदान की अकादमिक स्वीकार्यता का प्रमाण है।विशेष रूप से उनका चर्चित उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के एम.ए. हिंदी अंतिम वर्ष के पाठ्यक्रम में वर्ष 2022 में सम्मिलित किया गया। यह उपन्यास शहीद महेंद्र कर्मा विश्वविद्यालय, बस्तर के एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम में भी स्थान प्राप्त कर चुका है।
यह उपलब्धि केवल एक साहित्यकार की व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की शैक्षणिक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण अध्याय है।
‘बहु हाथ के पानी’ ने बढ़ाया साहित्यिक गौरव
दुर्गा प्रसाद पारकर का साहित्यिक संसार अत्यंत व्यापक है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, व्यंग्य, गीत, लोकसंस्कृति, शोध और अनुवाद सहित साहित्य की अनेक विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है।
उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘चिन्हारी’, ‘लोक-संस्कृति’, ‘जस-जंवारा’, ‘मया पीरा के संगवारी’, ‘सुवा’, ‘शिवनाथ’, ‘सुकवा’, ‘चंदा’, ‘सुघ्घर गांव’, ‘सुराजी गांव’, ‘केंवट कुंदरा’ और ‘बहु हाथ के पानी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त ‘शौर्य की प्रतिमूर्ति बिलासा देवी केंवट’, ‘सिधवा झन समझव’, ‘सुमिरव छत्तीसगढ़’, ‘इन्दरू केंवट’ तथा ‘राजा के विकास यात्रा’ जैसी कृतियाँ उनके रचनात्मक वैविध्य को प्रदर्शित करती हैं।
उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ का लोकजीवन, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत, मानवीय संवेदना और जनसरोकार प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुए हैं।
साहित्य की अनेक विधाओं में विशिष्ट पहचान
पारकर ने छत्तीसगढ़ी भाषा में अनुवाद के माध्यम से भी साहित्य को समृद्ध किया है। उन्होंने अनेक हिंदी साहित्यिक कृतियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है। उनके अनुवाद कार्यों में ‘सदामा के चाउर‘, ‘लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक‘, ‘चौरी–चौरा की कहानी‘, ‘भारतीय मूर्तिकला का परिचय‘, ‘निर्मला‘, ‘प्रतिज्ञा‘ जैसी कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।
सामाजिक समरसता की औपंयासिक कृति ‘ पांच पसर पानी’, छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘दू बीजा चाऊर’ एवं बालगीत ‘संगवारी ‘ प्रकाशनाधीन है।उनके उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ का हिंदी अनुवाद शैलेंद्र पारकर द्वारा वर्ष 2023 में किया गया साथ ही इनका अंग्रेजी अनुवाद हरिशंकर वर्मा द्वारा किया जाना उनकी रचनाओं की व्यापक पाठकीय पहुँच की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
लोकसंस्कृति और माटी की सुगंध को दी साहित्यिक अभिव्यक्ति
साहित्य सृजन के साथ-साथ उन्होंने संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘लोक मंजरी’, ‘छत्तीस लोक’ और ‘धरोहर’ जैसी पत्रिका का संपादन उनके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों को दर्शाता है।विभिन्न समाचार पत्रों में उनके व्यंग्य, लेख और साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं। वर्ष 1992 से 1994 तक छत्तीसगढ़ी व्यंग्य तथा वर्ष 1995 से 2000 तक दैनिक भास्कर में चिन्हारी स्तंभ के रूप में उन्होंने पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।वे न्यूज 18 डॉट कॉम न्यूज पोर्टल के माध्यम से 50 लोक संस्कृति पर केंद्रित निबंधों का प्रकाशन उनकी सक्रिय साहित्यिक उपस्थिति को दर्शाता है।
शोध एवं नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
उनकी साहित्यिक उपलब्धियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उनकी रचनाएँ शोधार्थियों के लिए अध्ययन का विषय बनी हैं।उनके साहित्य पर कलिंगा विश्वविद्यालय, रायपुर से गणेश कौशिक शोधार्थी द्वारा पीएच.डी. पूर्ण की गई है। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग से श्रीमती शिवांगी पाठक एवं गजेंद्र कश्यप,अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर से एक शोधार्थी शोध कार्य कर रहे हैं। भारती विश्विद्यालय दुर्ग से श्रीमती हर्षा देवांगन पीएच डी कर रहे हैं।
यह उपलब्धि प्रमाणित करती है कि उनका साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि शोध और अकादमिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण आधार बन रहा है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के प्रति उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ शासन, पद्मश्री पुनाराम निषाद, बिसम्बर यादव, प्रेम साईंमन, केयुर भूषण, शिवनाथ स्वाभिमान, छत्तीसगढ़ी लोक कला रत्न, वीणापाणि साहित्य, साहित्य सृजन, छेरछेरा, धरती पुत्र, साहित्य, पं. दानेश्वर शर्मा स्मृति, केंवट रत्न, छत्तीसगढ़ भाषा के संरक्षण में योगदान हेतु NACHA (NORTH AMERICA CHHATTISGARH ASSOCIATION) द्वारा CERTIFICATE OF HONOUR से सम्मानित किया गया तथा संस्कार भारती कला गुरु जैसे अनेक सम्मान उनकी साहित्यिक यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।वर्ष 2023 में ललित कला अकादमी, संस्कृति विभाग, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय साहित्य पुरोधा सम्मान से सम्मानित किया जाना उनके साहित्यिक अवदान की विशिष्ट उपलब्धि है।
नई पीढ़ी के लिए बने प्रेरणास्रोत
दुर्गा प्रसाद पारकर का व्यक्तित्व केवल एक लेखक या कवि का नहीं, बल्कि भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित एक कर्मयोगी का है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति, परंपरा, सामाजिक जीवन और क्षेत्रीय अस्मिता को अभिव्यक्ति दी है।
उनका मानना और प्रयास रहा है कि मातृभाषा को केवल बोलचाल तक सीमित न रखकर शिक्षा, शोध, साहित्य, रोजगार और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। उनकी साहित्यिक साधना का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि छत्तीसगढ़ी भाषा आज विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम, शोध और अकादमिक विमर्श में अपनी पहचान मजबूत कर रही है। दुर्गा प्रसाद पारकर का जीवन छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति समर्पण, संघर्ष और सृजनशीलता की प्रेरक गाथा है।
उन्होंने अपनी लेखनी से साहित्य को समृद्ध किया, अपने प्रयासों से मातृभाषा को उच्च शिक्षा में स्थान दिलाने की दिशा में योगदान दिया और अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति एवं अस्मिता को व्यापक पहचान प्रदान की। उनका उपन्यास ‘बहु हाथ के पानी’ विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल होना, उनकी कृतियों पर शोध होना राष्ट्रीय एवं अंतरास्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होना इस बात का प्रमाण है कि उनकी साहित्यिक यात्रा व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे बढ़कर छत्तीसगढ़ी भाषा के गौरव से जुड़ गई है।
निस्संदेह, दुर्गा प्रसाद पारकर केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य की प्रतिष्ठा, पहचान और भविष्य के लिए निरंतर साधनारत एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी लेखनी, उनकी विचारधारा और मातृभाषा के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।





